बिखर जाऊँगा

    
                         बिखर जाऊँगा 



दिल-ऐ-उम्मीद को तोड़ा है किसी ने,
जीने की उम्मीद को तोड़ा है किसी ने,
अब इतना टूट चुका हूं,
कि छूने भर से बिखर जाऊँगा।

वो हमसफर था,
हमनवा हो गया,
वो हमारा था मगर,
हमसे खफा हो गया,
अब डर लगता है,
कहीं उसके खवाबों से उठ न जाउगा,
अब इतना टूट चुका हूं कि,
छूने भर से बिखर जाऊंगा।


सफर में हमारा साथ छोड़ गया,
मेरे सारे सपने तोड़ गया,
मंज़िल अपनी देख कर,
मेरे राह मोड़ गया,
मगर फिर भी मैं चलता रहा,
कभी बिखरता ,
कभी संभलता रहा,
अकेले चला था,
अकेले ही चलता जाऊँगा,
अब इतना टूट चुका हूं कि,
छूने भर से बिखर जाऊँगा।


टूटे हुए अल्फ़ाज़ सा हूँ,
बिखर गया हूँ,
हूँ टूटे हुए हीरे सा,
मार खा खा के निखर गया हूँ,
मार दे ना तू और दोस्ती की,
कर एक न मुझ टूटे को,
अब और सितम न  सह  पाउँगा,
अब इतना टूट चुका हूं कि ,
तेरी नज़रों से ही बिखर जाऊँगा।



थक गया हूँ मैं,
बिन मंज़िल के,
रोज़ रोज़ के सफर से,
वादों को निभाते निभाते,
तुझे खोने के डर से,
रुक कर किसी,
आसमां के नीचे,
दो पल मैं सोना चाहूंगा, 
मगर डर है कहीं,
तेरी आहट से जग ना जाऊंगा,
अब इतना टूट चुका हूं,
छूने भर से बिखर जाऊँगा।






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