आंसुओं से फूल खिलते



                                                
                     आंसुओं से फूल खिलते





यह सफर ना छोड़े. साथ मेरा  
मंज़िल को भुलाना मुश्किल है 
इलज़ाम मैं अपनी मौत का किस पर दू 
मेरे अपने ही इस बात में  शामिल है 
कर्ज़दार करगए वो जिनके चेहरे से 
दिन की शुरुआत होती 
अगर मेरे आंसुओं से फूल खिलते 
तोह सोचो उन फूलों की क्या बात होती  | 

जिन्हे ढूंढता रहा दिल की गेहराईओ में 
उन्होंने नफरतों का निवाला मेरे दिल को खिला दिया 
तन्हा रहगया था जो तन्हाईओं में 
उसने आंसुओं को अपने नसीब से 
मिला लिया 
एक एहसास जो प्यार का था अब उनसे ना मेरी मुलाक़ात होती 
अगर मेरे आंसुओं से फूल खिलते 
तोह सोचो उन फूलों की क्या बात होती | 


पता नहीं लगता अब इस दिल को 
कौन दूर कौन करीब है 
शराफत के मखौटे पहनकर बैठे है 
इन जैसे लोगों से भरा नसीब है 
जहाँ जाम का नशा कम पड़जाए 
मेरी ऐसी हर एक शाम होती 
अगर मेरे आंसुओं से फूल खिलते 
तोह सोचो उन फूलों की क्या बात होती | 


मैं सोच सोच कर मर चूका 
की यह अब कैसा प्यार है 
जैसे सूरज की किरणे चूमती बारिश को 
ऐसे प्रशांत को तेरा इंतज़ार है 
कौस्ते रहते है यह शब्द 
काश .. इन शब्दों की कोई जुबांन होती 
अगर मेरे आंसुओं से फूल खिलते 
तोह सोचो उन फूलों की क्या बात होती|


                                                        ~ प्रशांत | 




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